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Sunday, October 9, 2011

महारानी मदालसा....

प्राचीन काल में काशी के एक राजा महापराक्रमी शत्रुजित् नाम के थे। उनके पुत्र का नाम ऋतुध्वज था। ब्रह्मवादिनी मदालसा इन्हीं ऋतुध्वज की पटरानी थी और विश्वावसु गन्धर्वराज की पुत्री थीं। इनका ब्रह्मज्ञान जगद्विख्यात है। पुत्रों को पालने में झुलाते-झुलाते इन्होंने ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया था।
उन दिनों गालव नाम के एक बडे भारी तेजस्वी ऋषि महाराज शत्रुजित् के राज्य में तपस्या करते थे। उनकी तपस्या में पातालकेतु नाम का एक राक्षस बडा ही विघन् करता था। जब ऋषि यज्ञ-याग अथवा नित्यकर्म करते तो पातालकेतु आकर उनके आश्रम में विष्ठा, मूत्र तथा रक्तादि की वर्षा करता। इससे ऋषि बडे दुखी होते। एक दिन किसी दैवी पुरुष ने ऋषि को एक घोडा देते हुए कहा-भगवन्! आप इस घोडे को लीजिये, इसका नाम कुवलयाश्व है। यह आकाश-पाताल में सब जगह जा सकता है, इसे आप जाकर महाराज शत्रुजित् के राजकुमार ऋतुध्वज को दें। ऋतुध्वज इस पर चढकर पातालकेतु तथा अन्यान्य राक्षसों को मारेगा। इतना कहकर वह दैवी पुरुष चला गया। ऋषि घोडे को लेकर महाराज शत्रुजित् के समीप आये।
ऋषि को आया हुआ देखकर महाराज ने उनका अ‌र्घ्य, मधुपर्क आदि से सत्कार किया और आने का कारण पूछा। ऋषि ने सब बातें बतायीं और वह कुवलयाश्व भी महाराज को दिया। पहले तो महाराज राजकुमार की कोमलता और बालपन को देखकर हिचके, फिर दैवी आदेश और ऋषि की आज्ञा समझकर उन्होंने स्वीकार किया। राजकुमार ऋतुध्वज को बुलाकर उन्होंने कहा- पुत्र! तुम ऋषि की आज्ञा से इस अश्व पर चढकर ऋषि के आश्रम पर जाओ और दुष्ट पातालकेतु को मारो। पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करके राजकुमार घोडे पर चढकर ऋषि के आश्रम पर पहुँचे।
उस समय पातालकेतु सूकर का वेष बनाये इधर-उधर आश्रम के समीप घूम रहा था। राजकुमार ने उसके पीछे अपना घोडा दौडाया, वह दौडते-दौडते एक बिल में घुस गया, कुवलयाश्व भी उसके साथ ही उस बिल में घुस गया। बिल के भीतर जाकर वहाँ एक बडा सुन्दर नगर राजकुमार ने देखा। वहाँ जाकर सूकर गायब हो गया, राजकुमार बडे सोच में पड गये।
एक सखी के संकेत करने पर वे भीतर गये, वहाँ एक परम सुन्दरी राजकुमारी को उदास मन देखा। राजकुमार का उस पर सहज स्नेह हो गया। उस सखी ने बताया कि ये गन्धर्वराज विश्वावसु की पुत्री हैं। राक्षस इन्हें चुराकर यहाँ ले आया है और इनके साथ विवाह करना चाहता है, किन्तु इन्होंने अपना विवाह राजकुमार ऋतुध्वज से करना निश्चय किया है।
राजकुमार ने अपना परिचय दिया और नारदजी की सहायता से वहीं मदालसा और ऋतुध्वज का गान्धर्वविवाह हो गया। पातालकेतु को मारकर और मदालसा को लेकर कुमार अपनी राजधानी में आये। महाराज ने तथा प्रजा ने कुमार का और नववधू का हृदय से स्वागत किया। राजकुमार मदालसा के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।
एक बार महाराज ने राजकुमार से कहा-तुम्हारे पास कुवलयाश्व है। जाओ राज्य में घूमो, जहाँ राक्षस हों उन्हें मारो। दुष्टों को दण्ड दो, ऋषियों को सुख पहुँचाओ। महाराज की आज्ञा शिरोधार्य करके राजकुमार अपने अश्व पर चढकर राज्य में घूमते रहे। पातालकेतु का एक भाई मायावी तालकेतु था। उसने ब्राह्मण का रूप बनाकर छल से राजकुमार से एक मणि ले ली, उसे लेकर वह वृद्ध ब्राह्मण के रूप में महाराज शत्रुजित् की राजधानी में पहुँचा और कह दिया कि कुमार एक राक्षस के साथ लडते-लडते मर गये। इस समाचार से सब लोग बडे दुखी हुए। मदालसा ने भी अगिन् में प्रवेश किया। बाद में जब ऋतुध्वज आये और उन्होंने अपनी पत्‍‌नी की यह दशा सुनी तो वे घोर तप करने लगे। नागराज अश्वतर के उद्योग से मृत्युञ्जय शिवजी की कृपा से कुमार को फिर मदालसा मिल गयी और राजकुमार सुखपूर्वक रहने लगे।
यथासमय महाराज शत्रुजित् स्वर्गवासी हुए। ऋतुध्वज राजा बने। उनके तीन पुत्र हुए; उनके नाम विक्रान्त, सुबाहु और अरिमर्दन थे। तीनों को महारानी ने बाल्यकाल में ही ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया और वे तीनों ही संसारत्यागी संन्यासी बन गये। अब जब चौथे पुत्र अलर्क को भी महारानी ब्रह्मज्ञान सिखाने लगी तो राजा ने कहा-देवि! इस पितृ-पितामह के चले आये राज्य को कौन करेगा? इसे तो संसार के योग्य रहने दो। रानी ने उनकी बात मान ली। अलर्क राजा हुए और उन्होंने गङ्गा-यमुना के संगम पर अपनी अलर्कपुरी नाम की राजधानी बनायी(जो आजकल अरैल के नाम से प्रसिद्ध है) मदालसा ने उसे एक उपदेश लिखकर दिया और कहा क जब बडी विपत्ति पडे तब इसे खोलना। एक बार राजा के ऊपर किसी दूसरे ने चढाई की। इसे विपत्ति समझकर अलर्क ने माता का पत्र खोला, उसमें ब्रह्मज्ञान का उपदेश था। महाराज उसी समय राज्य उस राजा को सुपुर्द करके वन चले गये। इस प्रकार योग्य माता मदालसा ने अपने चारों पुत्रों को ब्रह्मज्ञानी बना दिया।

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